पाचन से लेकर मानसिक सतर्कता तक, जानें विपरीतकरणी मुद्रा के लाभ

नई दिल्ली, 29 अगस्त (आईएएनएस)। योग शरीर और मन को संतुलित करने की प्राचीन विद्मा है। रोजमर्रा की भागदौड़ से शारीरिक थकान, तनाव और पाचन संबंधित समस्या आम हैं। इन्हीं आसनों में विपरीतकरणी है, जो न सिर्फ शरीर को नई ऊर्जा देता है, बल्कि थके हुए मन को भी शांत करता है।

‘विपरीतकरणी’ आसन एक संस्कृत शब्द है, जो उल्टे होने के एक कार्य को दर्शाता है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसमें ‘विपरीत’ का अर्थ ‘उलटा’ और ‘करणी’ का अर्थ ‘करना’ होता है। इस आसन में आपको सर्वांगासन के समान अपने पैरों को ऊपर की ओर करना होता है। यह आसन हमारे शरीर के लिए अनेक प्रकार से लाभदायक है।

यह एक ऐसा सरल अभ्यास है जिसे हर उम्र का व्यक्ति आसानी से कर सकता है और इसके नियमित अभ्यास से शरीर में रक्त संचार बेहतर होता है।

आयुष मंत्रालय के अनुसार, विपरीतकरणी आसन एक बेहद प्रभावी और विश्रामकारी योग अभ्यास है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘उलटी क्रिया वाला आसन’ या ‘प्रवाह को मोड़ने वाला आसन’ होता है। इसे आधुनिक योग में अक्सर दीवार के सहारे किया जाता है।

आयुष मंत्रालय ने इसके लाभ भी टिप्पणी की है। उनके अनुसार, यह आसन गुरुत्वाकर्षण के विपरीत काम करता है, जिससे पैरों और निचले शरीर से रक्त का प्रवाह वापस हृदय और मस्तिष्क की ओर सुचारू रूप से बढ़ता है। यह हाइपोएक्टिव थायरॉइड से जुड़ी समस्याओं को प्रबंधित करने में सहायक है।

विपरीतकरणी मुद्रा का एक और बड़ा लाभ थायरॉयड नियंत्रण है। साथ ही, यह हमारे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को शांत करता है, जिससे मानसिक सतर्कता बढ़ती है और तनाव से राहत मिलती है।

यह आसन ऐसे व्यक्तियों के लिए भी कारगर है, जिन्हें भूख कम लगती है। इसके नियमित अभ्यास से जठराग्नि तीव्र होती है, भूख बढ़ती है और पाचन क्रिया बेहतर होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इसके रोजाना अभ्यास से शरीर और मन दोनों में संतुलन बना रहता है। हालांकि, शुरुआत में 5-10 मिनट से अभ्यास करें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। गर्भवती महिलाओं, हाई ब्लड प्रेशर या गंभीर समस्या वाले मरीजों को डॉक्टर या योग विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही अभ्यास करना चाहिए।

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