मुंबई, 17 अगस्त (आईएएनएस)। आज अगर किसी बच्चे को संगीत में रुचि है, तो माता-पिता उसके लिए आसानी से संगीत शिक्षक खोज लेते हैं। वह किसी संगीत विद्यालय में जाकर शास्त्रीय संगीत सीख सकता है, मंच पर प्रस्तुति दे सकता है और अपनी कला को करियर भी बना सकता है। लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब भारतीय शास्त्रीय संगीत आम लोगों की पहुंच से काफी दूर माना जाता था।
संगीत का संबंध राजदरबारों और खास वर्ग से जोड़कर देखा जाता था और संगीतकारों को वह सम्मान नहीं मिलता था, जिसके वे हकदार थे। ऐसे समय में पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने न सिर्फ इस सोच को चुनौती दी, बल्कि शास्त्रीय संगीत को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए पूरी जिंदगी लगा दी।
पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर का जन्म 18 अगस्त 1872 को महाराष्ट्र के कुरुंदवाड़ में हुआ था। उनके पिता पंडित दिगंबर गोपाल पलुस्कर प्रसिद्ध कीर्तनकार थे। इसलिए बचपन से ही घर में भजन, कीर्तन और संगीत का माहौल मिला। लेकिन बचपन में ही उनकी जिंदगी में एक बड़ा हादसा हुआ। दत्त जयंती के दौरान पटाखे से उनके चेहरे और आंखों को गंभीर चोट लगी। इलाज की सुविधा तत्काल उपलब्ध नहीं हो सकी और उनकी आंखों की रोशनी चली गई। हालांकि कुछ समय बाद उनकी दृष्टि वापस आई, लेकिन इस घटना ने उनकी जिंदगी की दिशा जरूर बदल दी।
संगीत में उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए मिरज के राजा ने उन्हें प्रसिद्ध संगीतज्ञ बालकृष्णबुवा इचलकरंजीकर के पास प्रशिक्षण के लिए भेजा। इसके बाद पलुस्कर ने वर्षों तक गुरु के सान्निध्य में रहकर संगीत की बारीकियां सीखीं।
संगीत की शिक्षा पूरी करने के बाद पलुस्कर ने देश के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा शुरू की। उन्होंने कई शहरों और रियासतों का दौरा किया और वहां की संगीत परंपराओं को समझा। उस दौर में राजघरानों में अच्छे संगीतकारों को दरबारी गायक बनने के प्रस्ताव मिलना बड़ी बात मानी जाती थी।
पलुस्कर को भी ऐसे प्रस्ताव मिले। कहा जाता है कि बड़ौदा की महारानी जामनाबाई ने उन्हें दरबारी गायक के तौर पर काम करने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन पलुस्कर ने इसे स्वीकार नहीं किया। उनके मन में इससे कहीं बड़ा सपना था।
वह चाहते थे कि संगीत केवल राजाओं-महाराजाओं के दरबार तक सीमित न रहे, बल्कि आम आदमी भी इसे सीखे, समझे और इसका आनंद ले।
उस समय समाज में संगीतकारों को अक्सर सिर्फ मनोरंजन करने वाला समझा जाता था। पलुस्कर को यह सोच मंजूर नहीं थी। उनका मानना था कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा को छूने और इंसान को भीतर से बेहतर बनाने वाली साधना है।
इसी सोच के साथ उन्होंने संगीत को समाज के बीच ले जाने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर संगीत प्रस्तुतियां दीं और लोगों से मामूली शुल्क लेकर कार्यक्रम किए। यह उस समय की परंपरा के बिल्कुल उलट था, क्योंकि संगीत की प्रस्तुतियां आमतौर पर मंदिरों या राजदरबारों तक सीमित रहती थीं।
इसके बाद पलुस्कर ने 5 मई 1901 को लाहौर में गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना की। यह सिर्फ एक संगीत विद्यालय नहीं था, बल्कि भारतीय संगीत शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति थी।
इस संस्थान में संगीत सीखने के लिए किसी खास परिवार या वर्ग से होना जरूरी नहीं था। अमीर-गरीब, पुरुष-महिला और युवा-बुजुर्ग—सभी के लिए संगीत शिक्षा के दरवाजे खोलने की कोशिश की गई।
शुरुआत में पलुस्कर के लिए यह काम बिल्कुल आसान नहीं था। संस्थान चलाने के लिए उन्हें खुद धन जुटाना पड़ा। कई बार ऐसी स्थिति भी आई कि वह अकेले बैठकर तानपुरा बजाते और संगीत गाते थे। लेकिन धीरे-धीरे लोगों का भरोसा बढ़ा और विद्यार्थी वहां आने लगे।
उनका लक्ष्य केवल बड़े गायक तैयार करना नहीं था। उनकी सोच थी कि ऐसे लोग तैयार हों जो संगीत को समझें और उसकी कद्र करें। इसी सोच से जुड़ी उनकी मशहूर बात थी कि वह ‘तानसेन नहीं, कानसेन’ तैयार करना चाहते हैं- यानी ऐसे श्रोता जो अच्छे संगीत को पहचान और समझ सकें।
पलुस्कर की सोच सिर्फ बातों तक सीमित नहीं थी। जिन छात्रों के लिए फीस देना मुश्किल था, उनके लिए भी उन्होंने रास्ता निकाला। आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को संगीत सीखने का मौका दिया गया और उन्हें संगीत सिखाने के लिए भी तैयार किया गया, ताकि वे आगे चलकर अपने पैरों पर खड़े हो सकें।
बाद में उन्होंने स्कूल को लाहौर से मुंबई भी स्थानांतरित किया। विद्यार्थियों के लिए भवन और हॉस्टल की व्यवस्था करने में उन्होंने कर्ज तक लिया। कर्ज चुकाने के लिए लगातार सार्वजनिक कार्यक्रम किए। हालांकि 1924 में उनकी संपत्ति और संस्थान तक नीलामी की स्थिति में पहुंच गए, लेकिन उनकी संगीत साधना और विचारों की विरासत खत्म नहीं हुई।
पलुस्कर ने खुद संगीत की शिक्षा देने के साथ-साथ ऐसे शिष्य तैयार किए, जिन्होंने आगे चलकर भारतीय शास्त्रीय संगीत में बड़ा नाम कमाया। विनायकराव पटवर्धन, ओंकारनाथ ठाकुर, नारायणराव व्यास और बी.आर. देवधर जैसे उनके शिष्य आगे चलकर प्रसिद्ध संगीतज्ञ और शिक्षक बने। उनके बेटे दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर भी जाने-माने शास्त्रीय गायक बने।
पलुस्कर ने संगीत पर कई पुस्तकें भी लिखीं। उनका तीन खंडों में लिखा ‘संगीत बाल प्रकाश’ और रागों पर उनके ग्रंथ संगीत शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
21 अगस्त 1931 को पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर का निधन हो गया। वह 59 वर्ष के थे। लेकिन उनका काम उनकी जिंदगी के साथ खत्म नहीं हुआ। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को राजदरबारों की सीमाओं से निकालकर समाज के बीच पहुंचाने की जो कोशिश शुरू की थी, वह आगे चलती रही।





