‘परिसीमन और एफसीआरए संशोधन विधेयक पर सर्वदलीय बैठक बुलाएं’, डेरेक ओ’ब्रायन ने पीएम मोदी को लिखा पत्र

कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन से जुड़े प्रस्तावित कानून और विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। उन्होंने एफसीआरए संशोधन विधेयक को “दमनकारी” बताते हुए सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। डेरेक ओ’ब्रायन ने अपने पत्र में कहा कि आगामी संसद के मानसून सत्र के सरकारी कामकाज की सूची में परिसीमन से संबंधित कोई विधेयक शामिल नहीं है। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का संसदीय परंपराओं और प्रक्रियाओं को नजरअंदाज करने का रिकॉर्ड रहा है, इसलिए विपक्ष उसकी मंशा को लेकर आशंकित है। उन्होंने कहा कि पहले भी कई महत्वपूर्ण विधेयकों को अंतिम समय में सांसदों के सामने रखकर पूरक कार्यसूची में शामिल किया गया था। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि परिसीमन और एफसीआरए संशोधन विधेयकों के मामले में ऐसी प्रक्रिया न अपनाई जाए। ओ’ब्रायन ने उदाहरण देते हुए कहा कि वर्ष 2019 का जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक, जिसके जरिए राज्य का दर्जा समाप्त किया गया था, पूरक कार्यसूची में उस समय शामिल किया गया जब सांसदों को इसकी जानकारी विधेयक पेश होने के कुछ मिनट बाद मिली। उन्होंने इसे संसदीय प्रक्रिया के विपरीत बताया। टीएमसी सांसद ने कहा कि परिसीमन देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संघीय ढांचे से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। ऐसे विधेयक को लाने में सरकार को पूरी पारदर्शिता बरतनी चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि 16 अप्रैल 2026 को केंद्र सरकार ने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक लोकसभा में पेश किया था, लेकिन 17 अप्रैल को यह आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका और पारित नहीं हो पाया। एफसीआरए संशोधन विधेयक पर चिंता जताते हुए डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि यह प्रस्तावित कानून शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में दशकों से काम कर रही संस्थाओं को कमजोर कर सकता है। उनके अनुसार, इससे देशभर में ईसाई समुदाय द्वारा संचालित लगभग 54,000 शैक्षणिक संस्थान, जहां हर वर्ष करीब छह करोड़ छात्र शिक्षा प्राप्त करते हैं, प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रस्तावित संशोधन सरकार को विभिन्न सामाजिक संस्थाओं पर अत्यधिक प्रशासनिक नियंत्रण का अधिकार देगा, जिससे समाज के वंचित वर्गों के लिए काम करने वाले कई प्रतिष्ठित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त संगठन प्रभावित होंगे। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 और 26 के तहत प्रदत्त अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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