नई दिल्ली, 16 अगस्त (आईएएनएस)। ‘दिमागी नक्सली’ को लेकर हो रहे विवाद के बीच संसदीय कार्य और अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्टीकरण दिया है। किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री ने विपक्ष के नेताओं को ‘दिमागी नक्सली’ नहीं कहा है।
केंद्रीय मंत्री ने एक्स पर लिखा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के नेताओं को ‘दिमागी नक्सली’ नहीं कहा। ‘दिमागी नक्सली’ सिर्फ वे लोग हैं जो माओवादियों का समर्थन करते हैं और भारतीय संविधान को नहीं मानते, अलगाववादियों के साथ खड़े होते हैं और अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं और नॉर्थ-ईस्ट को भारत से अलग करने के लिए ‘चिकन नेक’ को काटना चाहते हैं।”
दरअसल, प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर देश के संबोधन में कहा था, “नक्सलवाद और माओवाद ने लाखों युवाओं के भविष्य को तबाह कर दिया, अनेक माताओं से उनके नौजवानों को छीन लिया, उन्हें बर्बाद कर दिया और मां-बाप के सपनों को चूर-चूर कर दिया। नक्सलवाद ने चार दशक तक हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से को, बड़ी आबादी को, बंदूक की नोक पर दबोचकर रखा था और संविधान की धज्जियां उड़ा दी थीं और देश के सामान्य नागरिकों की रक्षा में 3500 से ज्यादा पुलिस सुरक्षा बल के जवान शहीद हो गए।”
पीएम मोदी ने आगे कहा था, “2014 में आपने जब हमें मौका दिया, उसी दिन हमने संकल्प लिया था कि हम देश को नक्सलवाद से मुक्त करेंगे और आज मुझे खुशी है कि नक्सली-माओवादी हिंसा में आखिरी सांस की भी ताकत नहीं रही। हथियारबंद नक्सल तो गए, लेकिन दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं, वे हिंसा और अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए, भांति-भांति के दांव खेल रहे हैं, इन दिमागी नक्सलों को पहचानना होगा।”
प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान के बाद विपक्ष के नेता खुद को ‘दिमागी नक्सली” बताने लगे हैं। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “मुझे ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है।”
प्रधानमंत्री के बयान पर जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, “पहले उन्होंने अपने विरोधियों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा। अब वे उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कर रहे हैं। यह उनकी हताशा का निश्चित संकेत है। यह अलग बात है कि आखिरकार वे वही करते हैं जिसकी ये तथाकथित ‘अर्बन नक्सल’ या अब ‘दिमागी नक्सल’ मांग या वकालत करते हैं।”
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने ‘एक्स’ पोस्ट में कहा, “आप देश के युवाओं को ‘दिमागी नक्सल’ बुला रहे हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह आपसे सवाल करते हैं? 75 मिनट के उबाऊ भाषण में एक हारा हुआ, थका हुआ आदमी नजर आया जिसको जमीनी हकीकत का कोई अंदाजा नहीं। पंडित नेहरू को महापुरुष बुलाना अच्छा था।”





