बिहार : जल संरक्षण से गांवों की तस्वीर बदलने की कोशिश, किशोर बोले-पानी बचाना ही भविष्य की जरूरत

मुंगेर, 18 अगस्त (आईएएनएस)। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, गिरता भूजल और तेजी से सूखते पारंपरिक जलस्रोतों के बीच जल संरक्षण आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हो सकता है। ऐसे दौर में मुंगेर के किशोर जायसवाल पिछले तीन दशकों से जल संरक्षण और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में लगातार काम कर रहे हैं। वर्ष 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों राष्ट्रीय जल पुरस्कार से सम्मानित किशोर जायसवाल ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि पानी को केवल संसाधन के तौर पर नहीं, बल्कि खेती, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के जीवन की बुनियाद के रूप में देखना होगा।

किशोर जायसवाल के अनुसार, जल संकट का कारण सिर्फ बारिश की कमी नहीं है। असली चुनौती यह समझने की है कि बारिश का पानी कहां गिरता है, कितना बहकर निकल जाता है, कितनी मिट्टी अपने साथ ले जाता है और कितना हिस्सा जमीन के भीतर पहुंच पाता है। इसी सोच के साथ उन्होंने जलग्रहण विकास, भूजल पुनर्भरण और टिकाऊ कृषि को अपने सार्वजनिक जीवन का आधार बनाया।

सोसायटी फॉर वाटरशेड एंड रूरल डेवलपमेंट के माध्यम से काम करते हुए उन्होंने जल संरक्षण को केवल चेक डैम, खेत-तालाब, कुएं और मेड़बंदी जैसी संरचनाओं तक सीमित नहीं रखा। उनका जोर इस बात पर रहा कि इन परिसंपत्तियों के निर्माण के साथ ग्रामीण समुदाय में उनके संरक्षण और रखरखाव की जिम्मेदारी भी विकसित हो। उनका मानना है कि जब ग्रामीण योजना से लेकर श्रमदान और रखरखाव तक सहभागी बनते हैं, तभी जल संरक्षण का काम स्थायी रूप लेता है।

उनके प्रयासों से 105 से अधिक जलग्रहण परियोजनाओं और पहलों के जरिए करीब 600 गांवों तक पहुंच बनी। सरकारी योजनाओं, नाबार्ड, पंचायतों, तकनीकी संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों और समुदाय को एक साझा जल-दृष्टि से जोड़ना उनके काम की खास विशेषता रही है। वे ग्राम पंचायतों को जल सुरक्षा की स्थानीय इकाई के रूप में मजबूत करने और मनरेगा जैसी योजनाओं को जल संरक्षण से जोड़ने की वकालत करते हैं। किशोर जायसवाल पारंपरिक जल ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच बेहतर समन्वय को जरूरी मानते हैं

उनका कहना है कि पूर्वी भारत की आहर-पईन जैसी पारंपरिक प्रणालियों को हाइड्रोलॉजी, रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली, मौसम के आंकड़ों, मृदा परीक्षण और सूक्ष्म सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों से जोड़ा जाना चाहिए। बदलती जलवायु के बीच वे जल संचयन से आगे बढ़कर ‘जल बजट’ को गांवों की विकास योजना का हिस्सा बनाने पर जोर देते हैं। उनके मुताबिक, गांव को यह पता होना चाहिए कि उसके पास कितना पानी उपलब्ध है और कौन सी फसल को कितने पानी की जरूरत है।

फसल विविधीकरण, बागवानी, मृदा स्वास्थ्य और संतुलित सिंचाई को भी वे जल सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं। बांका के उल्ही नाला जलग्रहण क्षेत्र और मुंगेर, जमुई समेत अन्य इलाकों में किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र का अपना भूगोल और जल-विज्ञान होता है। इसलिए जल संरक्षण की एक जैसी योजना हर जगह लागू नहीं की जा सकती। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान तैयार करना जरूरी है।

नदी पुनर्जीवन को लेकर उनका मानना है कि स्वस्थ नदी के लिए स्वस्थ जलग्रहण क्षेत्र जरूरी है। अतुल्य गंगा जैसे प्रयासों से जुड़कर उन्होंने जलग्रहण, भूजल और नदी को एक ही जल-चक्र का हिस्सा मानने की जरूरत पर जोर दिया। मुंगेर के पोलो मैदान में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान प्रभारी मंत्री संजय कुमार द्वारा सम्मानित किए जाने को भी वे जल संरक्षण के प्रति सामाजिक सम्मान के रूप में देखते हैं।

उनका संदेश स्पष्ट है- एक बूंद पानी बचाना सिर्फ पानी बचाना नहीं है, बल्कि मिट्टी, फसल, किसान और गांव के भविष्य को सुरक्षित करना है। उनकी पूरी यात्रा का सार यही है कि जल संरक्षण संरचनाएं बनाने से आगे बढ़कर सामुदायिक स्वामित्व, वैज्ञानिक सोच और टिकाऊ जीवन-पद्धति विकसित करने का काम है।

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