तिरुचिरापल्ली, 7 सितंबर (आईएएनएस)। तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली के दो गांवों में मिट्टी के बर्तन बनाने वाले 40 से ज्यादा परिवारों के लिए विनायक चतुर्थी की तैयारियों पर संकट पैदा हो गया है। सही तरह की मिट्टी और रेत की सप्लाई कम होने से पारंपरिक मूर्तियां और मिट्टी के बर्तन बनाने का काम रुक गया है।
त्योहार से पहले कारीगरों का आखिरी हफ्ता चल रहा है लेकिन उनका बहुत सारा काम अभी भी अधूरा है। उनकी रोजी-रोटी मुख्य रूप से छोटी विनायक मूर्तियां, घर के बर्तन और पूजा में इस्तेमाल होने वाले अग्नि-पात्र (हवन कुंड) बनाने पर निर्भर करती है। हालांकि, खराब क्वालिटी के कच्चे मटीरियल की वजह से प्रोडक्शन धीमा हो गया है। समय पर ऑर्डर पूरा करने की भी चिंता बढ़ गई है।
हाल ही में इनामकुलथुर के एक तालाब से गाद (जमी हुई मिट्टी) हटाने की इजाजत दी गई थी। हालांकि लगभग 10 ट्रक मिट्टी गांवों तक पहुंचाई गई है लेकिन उसमें से सिर्फ कुछ हिस्सा ही बर्तन बनाने के काम आ सकता है। ज्यादातर मिट्टी में कीचड़ मिला हुआ है और उसमें मूर्तियां बनाने के लिहाज से उतनी मजबूती नहीं है। इस मिट्टी से बनी चीजों के सूखने, पकाने या ले जाने के दौरान टूटने का खतरा भी ज्यादा रहता है।
कावेरी और कोल्लिदम नदियों के पास होने की वजह से इन दो बस्तियों में पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम फल-फूल रहा था। नदी के तल से इकट्ठा की गई मिट्टी और बारीक रेत से एक मजबूत मिश्रण बनता था, जिसे आसानी से आकार दिया जा सकता था और जिसमें कम दरारें आती थीं।
पाबंदियों की वजह से कारीगर अब दूसरी जगहों से मिलने वाले मटीरियल पर निर्भर हो गए हैं। कई परिवार अब थुरैयूर, मुसिरी और लालगुडी में निजी खेतों से मिट्टी खरीदते हैं। दूर-दूर से मिट्टी खरीदने और उसे लाने-ले जाने के अतिरिक्त खर्च से बचत कम हो गई है।
पिछले पोंगल सीजन के दौरान भी प्रोडक्शन पर ऐसी ही मुश्किलें आई थीं, मिट्टी की सीमित सप्लाई की वजह से कई कारीगर स्थानीय मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त बर्तन नहीं बना पाए थे। त्योहारों के लिए बहुत ऊंची मूर्तियां बनाने वाले केंद्रों के उलट ये गांव आम तौर पर 1.5 फीट से छोटी मूर्तियां बनाने में माहिर हैं।
ये मूर्तियां ज्यादातर तिरुचि में ही बेची जाती हैं जबकि मिट्टी के बर्तन और अग्नि-पात्र तिरुचि, पेरम्बलुर और अरियालुर जिलों में अम्मन त्योहारों के लिए सप्लाई किए जाते हैं। कारीगरों को आशंका है कि सही मिट्टी मिलने में लगातार आ रही मुश्किलों से पीढ़ियों से चली आ रही यह कला कमजोर पड़ सकती है। वे यह भी चाहते हैं कि जब भी पर्यावरण और पानी के बहाव की स्थिति सुरक्षित हो, तो सरकारी देखरेख में नदी के तल से मिट्टी इकट्ठा करने की आसान मंजूरी मिले।
कारीगर चाहते हैं कि अधिकारी अच्छी क्वालिटी के मटीरियल का एक भरोसेमंद स्रोत ढूंढें और सप्लाई का एक रेगुलर और किफायती सिस्टम बनाएं। इस तरह की मदद न सिर्फ त्योहारों के मौसम में मांग पूरी करने के लिए जरूरी मानी जाती है बल्कि दोनों गांवों के परिवारों के लिए मिट्टी के बर्तन बनाने के काम को एक टिकाऊ रोजगार के तौर पर बचाए रखने के लिए भी जरूरी है।





